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समाज और विचारधारा » कमल संदेश

दीनदयाल उपाध्याय

म लोग संगठन के काम में लगे हुए हैं। संगठन शब्द का उच्चारण करते ही जो एक सामान्य कल्पना किसी भी व्यक्ति के सामने आएगी कि उसमें एक से अधिक लोग मिलकर काम करते हैं, अर्थात् यह एक प्रकार का समूहवाचक शब्द है। एक समष्टि है। एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं, अनेक को मिलाने का प्रश्न आकर खड़ा हो जाता है। इसलिए व्यक्ति और समष्टि का जो पारस्परिक संबंध है, उसको अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिए। क्योंकि इसके बिना स्वयंसेवक के नाते सही व्यवहार संभव नहीं है। इसके द्वारा विश्व के सामने जो जटिल समस्याएं बनी हुई हैं, उनका भी रास्ता निकाला जा सकता है।

मनुष्य के संबंध में प्रारंभ से ही कहा गया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। समाज में रहना उसका गुण है, उसकी प्रकृति है। यह जो उसकी प्रकृतिजन्य बात है, उसको कई बार लोग भूल जाते हैं। वास्तव में, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, इसका अर्थ यह नहीं और न ही यह लगाना चाहिए। फिर भी कई लोग ये अर्थ लगाते हैं कि समाज मनुष्यों से मिलकर बना है। कारण यह कि मनुष्य दिखाई देता है, समाज दिखाई नहीं देता। समाज एक समूहवाचक सत्ता है, क्योंकि कई चीजों को मिलाकर बना है। इस प्रकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसको समझने में लोगों ने मनुष्य पर अधिक बल दिया है। मनुष्य प्रमुख है और समाज बना है व्यक्ति के लिए, व्यक्ति का भला करने के लिए। व्यक्ति उसे बनाता है, बदलता है तथा बिगाड़ता है। इस प्रकार वे लोग व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हैं। उसको सर्वोपरि समझकर वे सारे कार्यकलापों का विचार करते हैं।

व्यक्ति जब से अपने को केन्द्र बनाकर चलने लगा है तो सामान्यत: वह समाज को भूलने लगा है। कई बार लाभ की चीजों को भी मनुष्य भूल जाता है। प्रकृति का नियम है कि भूख न हो तो भोजन नहीं करना चाहिए। क्या खाना चाहिए, क्या नहीं, यह बात पशुओं को भी मालूम रहती है। यह जहरीली घास है, ऐसा जानवरों को कौन बताने जाता है? ऐसा तो है नहीं कि उसमें विष लिखा रहता है। मनुष्य के लिए जैसे शीशी पर ‘विष’ या बिजली के खंभे पर ‘खतरा’ लिखा रहता है, ताकि लोगों को पता लग जाए कि इसमें खतरा है। पशु-पक्षियों को तो कोई बताता नहीं और उस पर लिखा भी नहीं रहता, लेकिन जंगल में चरनेवाली गाय जहरीली घास नहीं खाएगी। जिससे पशु को कोई बीमारी हो तो वह भोजन पशु नहीं खाएगा। लेकिन मनुष्य भूल जाता है। पेट भरा है, फिर भी मीठी प्लेट आ गई तो खा ही लो। कह नहीं सकते कि यह मनुष्य की मूर्खता है या आदत।

लेकिन भगवान ने इसके पेट को लचकदार बना दिया है। सामान्यत: वह खा लेता है। शरीर की प्रकृति से संबंधित वस्तुओं को वह भूल जाता है। वैसे ही समाज के बारे में भी यह भूल जाता है कि यह एक लाभ की वस्तु है। समाज से अलग रहकर वह शायद बोल नहीं पाएगा, जिस बच्चे को भेड़िए उठा ले जाते हैं, वह बोल नहीं पाता। हम यदि दो पांव पर खड़े हैं तो समाज के कारण। एक वैज्ञानिक का तो कहना है कि बुद्धि के विकास का श्रेय दो पांव पर खड़े होनेवाले मनुष्य को ही है। समाज से अलग रहकर वह शायद इस प्रकार बोल नहीं पाएगा। विचारों को तो व्यक्त करने का प्रश्न ही नहीं, भाषा भी वह समाज से सीखता है। अच्छे-बुरे का ज्ञान भी वह समाज से सीखता है। रॉबिन्सन क्रूसो का जहाज एक समुद्र में डूब गया।

उसने एक टापू पर आश्रय लिया। उसने वहां मकान बनाया, खेती की, लेकिन उसे ‘मैं अकेला हूं’ का भाव खटकता रहा। एक बार उसने एक जंगली कैदी को देखा, जिसे वहां के नरभक्षी मनुष्यों ने कैद कर रखा था और वह वहां से भागकर आया था। उस छूटे हुए कैदी को देखकर उसे असीम आनंद हुआ, यद्यपि वह उसकी भाषा तक को नहीं समझता था। उसके भावों को एक कवि ने व्यक्त किया है, जिसका भाव इस प्रकार है, मैं ही स्वामी हूं इस भू प्रदेश पर। इतना सब होने पर भी यहां की शांति मुझे खा रही है। जिस एकांत के बड़े-बड़े ऋषियों ने गान किए, वे आकर्षण कहां हैं? यहां का राज्य भी मुझे स्वीकार नहीं। नरक में रहना आसान है।’

इससे स्पष्ट है कि उसे निर्जनता से कितनी पीड़ा है। अकेले में सभी को भय लगता है। दो रहे तो बल आ जाता है। कहते हैं कि मिट्टी के भी दो पुतले होंगे तो उनमें बल होगा। समाज के कारण आज चाहे कितना भी विकार हुआ है, हमारे सब गुण निर्भयता, आत्मविश्वास आदि का भी विकास समाज के कारण ही है। समाज को निकाल दीजिए धर्म का कोई गुण नहीं रहेगा। धर्म के गुण समाज के कारण ही हैं। दूसरा व्यक्ति ही नहीं तो क्षमा किसको करेंगे? धैर्य की परीक्षा कैसे होगी? रोबिन्सन क्रूसो क्या चोरी करता? अत: यह सब गुण समाज सापेक्ष है। शुचिता भी सामूहिक होती है। धर्म ही समाज के आधार पर खड़ा है।

इतना सब कुछ होने के बाद भी मनुष्य में ये प्रवृत्ति आ जाती है। व्यक्ति—यही सब कुछ है। यह सब मेरे लिए है, यह प्रवृत्ति आई, इसलिए समाज का उपयोग मैं अपने लिए करूं, यह विचार उठने लगा। भगवान का भी यदि विचार करें तो ‘भगवान को सब समर्पित कर दूंगा’, कहने पर भी अधिकांश यह भावना बनी रहती है कि भगवान यानी मेरे लिए है भगवान। ऐसा कर दो, परीक्षा में पास कर दो, यह दु:ख निवारण कर दो, वह कर दो, ऐसी प्रार्थना में समर्पण का भाव नहीं रहता। हम भक्ति करते हैं, इसलिए कि वह हमारा बिना पैसा का बड़ा नौकर है। भगवान का स्मरण भी तब करते हैं जब जरूरत होती है। ऐसा ही भाव समाज के प्रति हो गया है।

व्यक्ति तथा समाज दोनों एक हैं, यह केंद्र का विचार बिगड़ जाने से समाज के प्रति दुर्लक्ष्य हो गया है। एक ऐसी प्रवृत्ति पैदा हो गई कि व्यक्ति की बुराइयों की बाढ़ आ गई। “Man is a social animal” यह कहने में भी जो मनुष्य को पशु कहा गया, उससे भी एक भाव उत्पन्न हुआ। पशु में भी जो अच्छी चीज दिखाई देती है, उसको न ग्रहण करके ‘आहार निद्रा भय मैथुनं च’ के सामान्य भाव से सुख ग्रहण करने की कल्पना और पुष्ट हो गई। मनुष्य का अपना सुख सामने आ गया और समाज का विचार सामने से हट गया। स्वार्थ बढ़ गया और दूसरों के अधिकारों का अपहरण प्रारंभ हो गया। दूसरों को अपने सुख के लिए गुलाम तक बनाया गया। पहले ‘हमारे लिए’ यह भाव था, फिर ‘मेरे लिए’ यह भाव आया। इस प्रकार दूसरों की ओर दुर्लक्ष्य किया जाने लगा। इस प्रकार दस लोगों को तो खूब खाने को मिलने लगा और इसके कारण वे बीमार होकर मरने लगे और शेष नब्बे लोग भूखे रहकर मरने लगे।

लेकिन आखिर तो मनुष्य में सहानुभूति की भावना भी है। वह सामाजिक प्राणी है। यह विचार आया कि यह प्रकृति के विपरीत है कि दस लोग इसलिए बीमार रहें कि वे अधिक खाएं, दूसरी ओर नब्बे लोग भूख से मरें। यूरोप वालों ने सोचा कि ये जो दस हैं, ये उत्पादन के साधनों के स्वामी हैं, शेष जीविका के लिए इस पर निर्भर करते हैं। इसलिए वे सब के सब एक गुलाम के रूप में हैं। यदि इनके हाथ से स्वामित्व निकाल लिया जाए तो जो पैदावार होगी, उसका बराबर विभाजन होगा। विषमता मिट जाएगी। कुछ लोगों के हाथ में जो सारी धन-संपत्ति सीमित हो गई है, उसको बांट दिया जाना चाहिए। अब प्रश्न रहा कि यह बांटा कैसे जाए और सोचते-सोचते आखिरी रास्ता जिसे दुनिया के लोग समाजवाद के नाम से कहते हैं, कार्ल मार्क्स ने बताया। उसने कहा कि दस लोगों से लेकर किसको दें? तो यह राज्य को दे दिया जाए। क्योंकि समाज तो अव्यक्त चीज है। समाज को दें अर्थात् किसको दें? अत: उन्होंने राज्य को दें, यह नारा लगाया। अगर यह विषमता समाप्त कर समता लानी है, तो इसे राज्य को दे दिया जाए।

जब व्यक्ति का स्वामित्व इन उत्पादनों के साधनों पर हो तो इसे व्यक्तिवाद का नाम दिया गया और समाजवाद इसे अपना विरोधी तथा पूंजीवाद के नाम से मानकर चलता है। पूंजी तो हमारे लिए चाहिए होती है। अत: यह नाम गलत हुआ। छोटे-से-छोटे किसान को भी बीज, हल आदि के रूप में पूंजी चाहिए, जो आर्थिक उत्पादन के सामने माने जाते हैं, श्रम, पूंजी तथा भूमि आदि इन सबसे पूंजी का अस्तित्व है। पूंजी से मतलब पूंजीवाद नहीं लेना चाहिए, जिस प्रकार व्यक्ति से मतलब जातिवाद नहीं होता, संप्रदाय का मतलब संप्रदायवाद नहीं होता, जाति रहने से मतलब जातिवाद नहीं होता। जब ये चीजें विकृत रूप से आकर प्रकट होती हैं और शेष विचार पीछे पड़ जाते हैं तो वाद उत्पन्न होता है— पूंजीवाद, व्यक्तिवाद, संप्रदायवाद आदि।

जब सामान्य जीवन की कल्पनाओं की तिलांजलि देकर, दूसरों की कठिनाई देकर भी केवल पूंजी कमाने की धुन हो, तभी पूंजीवाद कहलाएगा। इसमें केवल मुनाफे का विचार होता है। कोई भी ढंग उसके लिए अपनाना पड़े, वह अपनाता है। पूंजीवाद का जो विरोध आया तो इसी रूप में। उसमें से विषमताएं पैदा हुईं। मनुष्य की सहानुभूति की भावना, चेतना जाग्रत् हुई। इसे घटाना ही चाहिए। बहुत दिनों तक इससे लड़ते रहे। अंत में उत्पादन के साधनों को समाज के हाथों में दे देना चाहिए, यह विचार आया। मार्क्स ने इतिहास का विश्लेषण करके यह बताया कि समाज का इतिहास आर्थिक संघर्ष का इतिहास है। उसने नियम प्रतिपादित किए कि आर्थिक उत्पादन के साधन समाज को दे देने चाहिए। समाज को दे दें अर्थात् किसको दे दें। समाज तो अव्यक्त चीज है। जैसे समाज सेवा कहें तो प्रश्न उठता है किसकी सेवा? मार्क्स ने बताया कि राज्य उसका प्रतिनिधित्व करता है। इस पर राज्यवाद का जन्म हुआ।

उन्होंने सोचा कि इससे समस्या हल हो जाएगी। वे भूल गए कि राज्य चलानेवाले भी व्यक्ति होते हैं। जिस पर सत्ता केंद्रित होती है, वे शोषण नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है? व्यक्ति का सामान्य आदर्श दान, क्षमा, दया, आदि जो पूंजीवाद में थे, वह यद्यपि भौतिक आदर्श ही थे परंतु मार्क्स ने उन्हें भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार समाज-निष्ठा के समाप्त हो जाने के कारण जो दूसरे के हित के लिए सोचने की भावना थी, वह भी समाप्त होने लगी। वहां प्रचलित संप्रदाय ईसाइयत और इसलाम में भी जो सामान्य पवित्रता है, जैसे दान पद्धति, प्रेम, सेवा, ईमानदारी आदि इनका भी जो भाव समाज में था, अब समाप्त होने लगा। यह सब तो पूंजीवाद की शोषक व्यवस्थाएं हैं, ऐसा बताकर इन सब सामान्य चीजों को भी समाप्त कर दिया गया। इन व्यवस्थाओं के अनुसार जो छह रोटी वाले थे, उन्हें यह बताया जाता था कि यदि दो रोटी दान करोगे तो ये दो रोटी तुम्हें स्वर्ग में मिलेंगी। वह दो रोटी भी उसने दान देनी बंद कर दी और सोचा कि छह की छह रोटी अपने पास ही रख लीं तो कोई बात नहीं।

दूसरी जो नई गलती इस वाद ने की, वह यह थी कि इसने लोगों के सामने भौतिक दृष्टिकोण रखा। इंद्रिय सुख ही ठीक है। यही जीवन का लक्ष्य है। अन्य प्रेरणाएं, जिनमें मन का सुख प्राप्त होता है, जिसके कारण मां स्वयं न खाकर बालक को खिलाती है तथा बुद्धि का सुख व आत्मिक सुख इन सबका विचार उसने नहीं किया। सारे विश्लेषण का आधार भौतिक सुख ही रहा। केवल एक ही प्रेरणा बची है, पर उसका विचार शायद मार्क्स ने तो नहीं किया था। उसने यह तो जरूर कहा था कि समाज के ठेकेदारों से लड़ना पड़ेगा। उनसे लड़ने को कौन तैयार हुए, जिनको केवल दु:ख हुआ था। जो मानवीय सहानुभूति से पूर्ण थे ऐसे वर्ग के लोग, जो भूखों को नहीं देख पाते थे, इनकी प्रेरणा भौतिकवादी विश्लेषण के अंतर्गत नहीं आती। जिन्हें सामान्य दु:ख हुआ और वह समाज-निष्ठा लेकर खड़े हुए, ऐसे समूह के बलबूते पर एक वर्ग तैयार हुआ, जिसने समाज का विचार किया। समाजवाद में समाज के कल्याण को प्रमुखता थी।

(संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग, नई दिल्ली; 18 जून, 1963)

(News Source -Except for the headline, this story has not been edited by Bhajpa Ki Baat staff and is published from a hindi.kamalsandesh.org feed.)

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